Monday, June 20, 2011

‘ पिता – ईश्वर का वरदान ‘

‘ पिता – ईश्वर का वरदान ‘

‘पिता’
है ईश्वर का रूप ,
है पावन एक धूप ,
है स्नेह भरा संबल ,
है खुशियों का नभतल ,
है प्यार जिनका अमूल्य ,
है रिश्ता वो अतुल्य ,
है जिनसे मेरी पहचान ,
ईश्वर का वो है वरदान !

- सोनल पंवार

Friday, February 4, 2011

' प्रण '

’ प्रण ‘

नित नए बनते हैं प्रण ,
और टूट जाते हैं प्रतिक्षण !
प्रण लेना तो है सरल ,
लेकिन उसे निभाना है मुश्किल !
हर रोज़ बनते-टूटते हैं ये प्रण ,
फिर भी हम लेते हैं ये प्रण !
प्रण लेना ही है तो
चलो हम मिलकर यह प्रण लें ,
प्रण लें किसी एक बच्चे को साक्षर करने का ,
प्रण लें किसी एक बुरी आदत को छोड़ने का ,
प्रण लें किसी एक गरीब की मदद करने का ,
प्रण लें किसी रोते हुए को हंसाने का ,
प्रण लें सबके बीच खुशियों को बाँटने का ,
प्रण लें इंसानों के बीच की नफरत मिटाने का ,
प्रण लें किसी एक बेसहारा को सहारा देने का ,
प्रण लें किसी पथभ्रष्ट को सही राह दिखाने का ,
प्रण लें अन्याय के प्रति विरोध प्रकट करने का ,
प्रण लें किसी एक अन्धविश्वास को मिटाने का ,
प्रण लें किसी भी बुराई को न अपनाने का ,
प्रण लें प्रेम और भाईचारे को बढ़ाने का ,
और प्रण लें अपने इस प्रण को निभाने का !
ग़र अपने देश की एक अरब आबादी में से
हर कोई लेकर एक नया प्रण ,
पूरा करे यदि उसे लगन से ,
तो मिल जाएगा हमें चारों तरफ
सुख, समृद्धि और शांति का वातावरण ,
और मिल जाएगी अपने देश को
विश्व पटल पर एक नई पहचान !

– सोनल पंवार

Tuesday, January 25, 2011

' यादें '

' यादें '
ज़िन्दगी के रंगीन पन्नों को
यादों की शबनम में भिगोना है मुझे ,
यादों के हर एक पल को
अपनी आँखों में संजोना है मुझे ,
बीत जाए ना ये ज़िन्दगी
वक़्त की आग़ोश में ,
वक़्त को हाथों में समेटकर
खुद को यादों के समंदर में डुबोना है मुझे !
- सोनल पंवार

'माँ और पिता'

" माँ और पिता "

ईश्वर की बनाई ममता की मूरत है 'माँ' ,
ईश्वर ने गढ़ी वो अनमोल कृति है 'पिता' !
जीवन की तपती धूप में शीतल छाँव है 'माँ' ,
जीवन के अंधेरों में प्रदीप्त लौ है 'पिता' !
ज़िन्दगी के आशियाने का स्तंभ है 'माँ' ,
उस स्तंभ का आधार-नींव है 'पिता' !
मेरे जीवन का अस्तित्व है जिनसे ,
ईश्वर की वो अनमोल सौगात है - 'माँ और पिता' !

- सोनल पंवार

Monday, October 11, 2010

' दर्द '

' दर्द '

कोई शाख़ से पूछे ,
उसके पत्तों के गिरने का दर्द !
कोई लहरों से पूछे ,
साहिल तक न पहुँच पाने का दर्द !
कोई हवाओं से पूछे ,
कभी न थम पाने का दर्द !
कोई एक मकान से पूछे ,
नींव के हिल जाने का दर्द !
कोई चमन से पूछे ,
उसके उजड़ जाने का दर्द !
कोई इंसान से पूछे ,
अपनों से बिछुड़ जाने का दर्द !
ये दर्द सह पाना होता है बड़ा मुश्किल ,
कोई इस दर्द से पूछे ,
इसके अस्तित्त्व के होने का दर्द !

- सोनल पंवार

Sunday, August 29, 2010

" मेरा देश ( तब से अब तक ) "

" मेरा देश ( तब से अब तक ) "

सोने की चिड़िया था कभी ,
उन्मुक्त हवाओं का था बसेरा ,
नारी की जहाँ होती थी पूजा ,
ऐसी पावन भूमि का देश था मेरा !

अंग्रेजों ने इस भूमि पर आकर ,
इस चिड़िया के पर थे काट डाले ,
फूट डालो-राज करो की नीति से ,
इस देश के हज़ारों टुकड़े कर डाले ,
गुलामी की जंजीरों में इसे जकड़ कर ,
आज़ाद सुबह के सपने चूर कर डाले !
तब उदय हुआ उन वीर-महात्माओं का ,
जिन्होंने आज़ादी के स्वप्न को साकार करने के लिए ,
कर दिए अपने प्राण न्यौछावर ,
जिनकी शहादत और कुर्बानी से ,
मिट गया गुलामी के अंधेरे का सागर !
१५ अगस्त , १९४७ का था वो दिन ,
जब मेरे देश को मिला था वो आज़ाद सवेरा !
लेकिन क्या हकीकत में था वो आज़ाद सवेरा ?

हम तन से तो आज़ाद हुए है ,
पर मन और विचारों से अब भी है गुलाम !
आज भी यहाँ जाति, धर्म, मज़हब के नाम पर
होते है दंगे-फसाद , मार-काट और लड़ाई ,
देश को खोखला करने वाली आतंकवाद की ये जड़े ,
इस देश की नींव में है समाई ,
भ्रष्टाचार में लिप्त है यहाँ हर कोई ,
अमीर-गरीब के बीच नित बढ़ रही है खाई !
दहेज़ और अत्याचारों से पीड़ित है यहाँ नारी ,
हर पल एक डर की छवि उसके मन में है समाई !
जिन मासूम निगाहों में पलते थे स्वप्न कई ,
उनमें पल रहा है आज अनजाना डर कहीं !
चारों तरफ हाहाकार है, खौफ है, आतंक है ,
ये कैसी है डर के साए में आज़ादी ?
क्या अब भी हम कहेंगे कि हम आज़ाद है ?

जब यहाँ मानवता , भाईचारा और सौहार्द्र होगा ,
जब नारी का यहाँ सम्मान होगा ,
जब यहाँ हर इंसान तन से ही नहीं
मन और विचारों से भी आज़ाद होगा ,
तब सही मायने में आज़ाद होगा 'मेरा देश' !

- सोनल पंवार

Saturday, August 14, 2010

”…….आतंकवाद क्यूँ …….? “

”……आतंकवाद क्यूँ …….? “

है आतंक-ही-आतंक फैला इस जहान में ,
है दर्द-ही-दर्द फैला इस जहान में !
आतंक जो फैला रहा वो भी एक इंसान है ,
आतंक के साए में जो पल रहा वो भी एक इंसान है ,
तो एक इंसान दूसरे इंसान का दुश्मन क्यूँ है ?
इस प्यारे-से जहान में ये आतंकवाद क्यूँ है ?

कतरा-कतरा खून का है बिखरा हुआ यहाँ ,
हर शहर हादसों का शिकार हुआ यहाँ ,
आज़ाद हुआ ये देश आतंक का गुलाम क्यूँ है ?
इस प्यारे-से जहान में ये आतंकवाद क्यूँ है ?

यहाँ मन्दिर,मस्जिद,गिरिजाघर और गुरुद्वारे में ,
चैन और अमन का पाठ पढ़ाती गीता,कुरान,बाइबिल है ,
तो धर्म और मज़हब के नाम पर उठती ये दीवार क्यूँ है ?
इस प्यारे-से जहान में ये आतंकवाद क्यूँ है ?

आतंक की लपटों से दहला है ये जनजीवन सारा ,
आतंक के जलजले से बिखरा जग-संसार सारा ,
अपने ही वतन में हर वक्त इन आंखों में खौफ क्यूँ है ?
इस प्यारे-से जहान में ये आतंकवाद क्यूँ है ?

लहू का है एक ही रंग हर इंसान का यहाँ ,
दर्द का एहसास है एक हर इंसान का यहाँ ,
तो अलग-अलग धर्मों में बंटता हर इंसान क्यूँ है ?
इस प्यारे-से जहान में ये आतंकवाद क्यूँ है ?

आज़ादी की राह में न जाने कितने शहीद हुए ,
आतंक को मिटाने की कोशिश में कितने ही कुर्बान हुए ,
आज़ाद वतन की सरजमीं पर अब भी लाशों के ढेर क्यूँ है ?
इस प्यारे-से जहान में ये आतंकवाद क्यूँ है ?

इस एक सवाल पर कई और सवाल है खड़े ,
इस जवाब की तलाश में कई नेता है अड़े ,
फिर भी हर जवाब उलझन से भरा क्यूँ है ?
इस प्यारे-से जहान में ये आतंकवाद क्यूँ है ?
मेरे इस प्यारे-से जहान में ये आतंकवाद क्यूँ है ?……।

- सोनल पंवार