Saturday, June 14, 2014

' पिता '

   Happy Father's Day

             ' पिता '

जैसे किसी बगिया की फुलवारी का 
बाग़बान रखता है ध्यान ,
वैसे ही पिता के साये में 
बच्चों के होठों पर खिलती है मुस्कान !
पिता का साया है वो आसमान ,
जिससे मिलता है उन्हें खुशियों का जहान ,
बगिया के हर एक फूल-सा ,
महकता है उनका बचपन नादान !
बिना बाग़बान के जैसे सूना है ये चमन ,
बिन हवा के नीरव है ये गगन ,
वैसे ही बिना पिता के साये के ,
खामोश-सहमा है ये बचपन !

                    - सोनल पंवार

Friday, November 11, 2011

' मेरा बचपन '

' मेरा बचपन '

पापा की गोदी में
अठखेली करता वो बचपन ,
माँ के आँचल में
छुपता-इठलाता वो बचपन ,
आँखों में शरारत, ग़मों से अनजान ,
हँसता-मुस्कुराता वो बचपन ,
काश कोई लौटा दे ,
वो प्यारा-सा मेरा बचपन !

- सोनल पंवार

Friday, September 2, 2011

' सुनहरी शाम '

’ सुनहरी शाम ‘

बीते लम्हें,बीते पल,बीती बातें ,
एक दिन यूँ ही याद बन जाएगी !
जीवन की ये सुनहरी शाम ,
एक दिन यूँ ही ढल जाएगी !

न होंगे पास अपने ,
न होंगे अनगिनत सपने ,
रिश्तों की तब न आहट होगी ,
जीवन की ये सुनहरी शाम ,
एक दिन यूँ ही ढल जाएगी !

न होगा ज़िन्दगी से कोई शिकवा ,
न होगी कोई शिकायत ,
वक़्त के हाथों मिलेगी सिर्फ बेबसी ,
न होगी ज़िन्दगी में कोई ज़रूरत ,
किस्मत से तब न कोई ज़िरह होगी ,
जीवन की ये सुनहरी शाम ,
एक दिन यूँ ही ढल जाएगी !

न मिलेगा साथ अपनों का ,
न मिलेगा प्यार अपनों का ,
रिश्तों के नाम पर केवल तन्हाई होगी ,
जीवन की ये सुनहरी शाम ,
एक दिन यूँ ही ढल जाएगी !

- सोनल पंवार

Friday, June 24, 2011

' आँखें '

“ आंखें “

रिश्तों में हो मिठास ,
तो आंखों में चमक आती है !
जब बिगड़ती है कोई बात ,
तो आंखों से छलक जाती है !
ये आंखें ही तो होती है मन का दर्पण ,
जिनसे मन की हर बात झलक जाती है !

– सोनल पंवार

Monday, June 20, 2011

' पिता '

' पिता '

हाथों को थाम कर जिनके
मैंने चलना है सीखा ,
गोदी में जिनके सुकून भरा
मेरा बचपन है बीता ,
विशाल हाथों में जिनके
समा जाती थी मेरी नन्हीं-सी मुट्ठी ,
उन ‘पिता’ की स्नेह भरी आँखों में
मैंने स्वयं ईश्वर को देखा !

- सोनल पंवार







‘ पिता – ईश्वर का वरदान ‘

‘ पिता – ईश्वर का वरदान ‘

‘पिता’
है ईश्वर का रूप ,
है पावन एक धूप ,
है स्नेह भरा संबल ,
है खुशियों का नभतल ,
है प्यार जिनका अमूल्य ,
है रिश्ता वो अतुल्य ,
है जिनसे मेरी पहचान ,
ईश्वर का वो है वरदान !

- सोनल पंवार

Friday, February 4, 2011

' प्रण '

’ प्रण ‘

नित नए बनते हैं प्रण ,
और टूट जाते हैं प्रतिक्षण !
प्रण लेना तो है सरल ,
लेकिन उसे निभाना है मुश्किल !
हर रोज़ बनते-टूटते हैं ये प्रण ,
फिर भी हम लेते हैं ये प्रण !
प्रण लेना ही है तो
चलो हम मिलकर यह प्रण लें ,
प्रण लें किसी एक बच्चे को साक्षर करने का ,
प्रण लें किसी एक बुरी आदत को छोड़ने का ,
प्रण लें किसी एक गरीब की मदद करने का ,
प्रण लें किसी रोते हुए को हंसाने का ,
प्रण लें सबके बीच खुशियों को बाँटने का ,
प्रण लें इंसानों के बीच की नफरत मिटाने का ,
प्रण लें किसी एक बेसहारा को सहारा देने का ,
प्रण लें किसी पथभ्रष्ट को सही राह दिखाने का ,
प्रण लें अन्याय के प्रति विरोध प्रकट करने का ,
प्रण लें किसी एक अन्धविश्वास को मिटाने का ,
प्रण लें किसी भी बुराई को न अपनाने का ,
प्रण लें प्रेम और भाईचारे को बढ़ाने का ,
और प्रण लें अपने इस प्रण को निभाने का !
ग़र अपने देश की एक अरब आबादी में से
हर कोई लेकर एक नया प्रण ,
पूरा करे यदि उसे लगन से ,
तो मिल जाएगा हमें चारों तरफ
सुख, समृद्धि और शांति का वातावरण ,
और मिल जाएगी अपने देश को
विश्व पटल पर एक नई पहचान !

– सोनल पंवार